आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी संस्कृति, सभ्यता व संस्कारों को दरकिनार करती युवा पीढ़ी।

  स्वामी विवेकानंद जी का युवाओं एवं युवतियों को सन्देश और आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी संस्कृति, सभ्यता व संस्कारों को दरकिनार करती युवा पीढ़ी।
आज हम साँस्कृतिक संक्रमण के ऐतिहासिक दौर से गुजर रहे हैं। भौतिकवाद अपनी चरम पराकाष्ठा पर है। संयम, सेवा, तप, त्याग और सादगी जैसे नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों के अस्तित्त्व पर गम्भीर प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है। युवा वर्ग में इनके प्रति किसी गम्भीर आस्था का सर्वथा अभाव ही दिखता है। चारों ओर जब सुख, सुविधा, वैभव-विलास एवं स्वार्थ अनाचार का ही वर्चस्व दिखाई देता है, तो संयम, सेवा, त्याग, सहिष्णुता, विनम्रता का आदर्शवादी मार्ग उसे घाटे का ही सौदा लगता है। 
भारतीय संस्कृति और परंपराओं को छिन्न-भिन्न कर, सारी वर्जनाओं को तोड़ती, पाश्चात्य सभ्यता के रंग में रंगी युवा पीढ़ी पश्चिमी देशों के अंधानुकरण के दौर से गुजर रही है। 
आधुनिकता की चकाचौंध में हमें अपनी संस्कृति, सभ्यता व संस्कारों को दरकिनार नहीं करना चाहिए। आज के समय में हम शिष्टाचार, नैतिकता को भूलते जा रहे हैं। शिष्टाचार व नैतिकता हमारे जीवन में बहुत अहम चीजें हैं। किसी भी विषय को ले लें, हम अपनी युवा पीढ़ी पर पूरा दोष डाल कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। सवाल यह नहीं कि आज की युवा पीढ़ी में नैतिकता व शिष्टाचार की कमी हो रही है। सवाल यह भी है कि क्या सिर्फ युवा पीढ़ी पर दोषारोपण से हमारी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है। क्या हम युवा पीढ़ी के लिए अपना कर्तव्य निष्ठा से निभा रहे हैं। क्या सारी गलती युवा पीढ़ी की ही है। मुझे नहीं लगता कि आज की युवा पीढ़ी सौ प्रतिशत गलत है। आज उनमें संस्कारों की कमी अगर हो रही है तो उसकी वजह सिर्फ और सिर्फ हम ही हैं। क्यों हम उनमें संस्कार नैतिकता शिष्टाचार नहीं भर पा रहे हैं। यह एक सोचने का विषय है। बच्चों का अनैतिक होना हमारी कमजोरी है।
यह बात जरूर है कि आजकल की युवा पीढ़ी नैतिकता तथा शिष्टाचार को भूल सी गई है। संस्कारों का अभाव कहीं भी देखने को मिल सकता है। युवा पीढ़ी में संस्कार, नैतिकता व शिष्टाचार की कमी न हो, इसके लिए हमें स्वयं से ही शुरुआत करनी होगी।
संस्कार, नैतिकता, शिष्टाचार, सभ्यता और जीवन दर्शन का सम्मान देश के नागरिकों का धर्म भी है। संस्कार यानी हमारी जड़ें हमारी पहचान, संस्कार शिष्टाचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तातरित होते आए हैं।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली में सबसे बड़ा दोष यह है कि वह हमारे युवाओं के व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक नहीं है। शिष्टाचार एवं नैतिकता किसे कहा जाता है यह कभी सिखाया ही नहीं जाता। बल्कि गणित, विज्ञान, अंग्रेजी आदि विषयों पर जोर दिया जाता है, जिससे बच्चे पढ़ना तो सीख रहे हैं, लेकिन संस्कार, नैतिकता व शिष्टाचार किसे कहते हैं उससे अनभिज्ञ हैं। हमारे स्कूलों में बच्चों के व्यक्तित्व का विकास सामाजिक वातावरण में रखते हुए करना चाहिए।

अनैतिकता ही अशिष्टता का कारण है। अनैतिकता को समाप्त करने के लिए हमें बच्चों को उसी प्रकार से शिक्षित करने की जरूरत है। संस्कार होंगे तो बच्चों में नैतिकता व शिष्टाचार भी आएंगे। हम अगर बच्चों को पुस्तकीय ज्ञान के साथ इस प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था करें जिसमें बच्चों में नैतिकता व शिष्टाचार को बढ़ावा मिले तो जल्द ही यह बातें सुनने को नहीं मिलेंगी कि आज की पीढ़ी में अनैतिकता व अशिष्टता है। जब हम उन्हें ज्ञान ही नहीं देंगे तो उनसे शिष्टाचार की आस कैसे लगाएं।

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