देश के विकास में आर्थिक विकास की भूमिका और योगदान और नरसिम्हा राव के साथ किया गया पक्षपात
देश के विकास में आर्थिक विकास की भूमिका और योगदान और नरसिम्हा राव के साथ किया गया पक्षपात
किसी भी देश के विकास में आर्थिक विकास सबसे बड़ी भूमिका निभाता है। देश में सामाजिक विकास हो या आधारभूत सरंचित विकास दोनो देश के आर्थिक विकास पर निर्भर होते है। या यूं कहे की वर्तमान समय मे आर्थिक विकास ही देश के विकास का आधार है। आज भारत जो विश्व की सबसे तेजी से उभरती आर्थिक शक्ति और विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बना है उसमें देश के आर्थिक विकास का बहुत बड़ा योगदान है।
भारत पुरातन समय में अपने आर्थिक विकास के लिए पूरे विश्व में जाना जाता था जिससे भारत को विश्व गुरु और सोने की चिड़िया कहते थे। गुलामी के समय भारत की अर्थव्यवस्था को पूर्ण रूप से आक्रांताओं ने नष्ट और गहरे घाव दिए थे। जिसके घाव आज भी आजादी के 70 वर्ष बाद भी पूर्ण रूप से भरे नही है। आज भी भारत देश जिसकी अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी और सुदृढ़ थी आज वो खरबों के कर्ज में डूबा है। आजादी के बाद देश के आर्थिक विकास के लिए सरकारों ने बहुत प्रयास बजट के माध्यम से और नीतियों के माध्यम से किए है। जिसमें से नई विकास नीति भारत के आर्थिक विकास में सबसे प्रमुख नीति कहा जा सकता है। यह नीति उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (एलपीजी) के नाम से भी जानी जाती है। यह नीति 1991 में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री पीवी नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह जो उस समय के तत्कालीन वित्तमंत्री थे उनके द्वारा बनाई गई थी। जिसने भारत की दिशाहीन व्यवस्था की दिशा प्रदान करने में अहम भूमिका निभाई थी। आश्चर्य की बात ये है कि उस नीति का श्रेय हमेशा पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह जी को दिया गया है जो कि मुझे एक तरह से अन्याय नजर आता है। 1991 में औद्योगिक और वाणिज्य मंत्रालय भी श्री नरसिम्हा राव के पास था और नई आर्थिक नीति में से लाइसेंस परमिट राज को खत्म करने का काम भी नरसिम्हा राव ने ही किया था। लाइसेंस परमिट राज को खत्म न करने से नई आर्थिक नीति का कोई भी औचित्य नही होना था। इसलिए नई आर्थिक नीति का श्रेय नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह दोनो को दिया जाना चाहिए। पिछले वर्ष देश मे पुरानी अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को खत्म कर वस्तु एवम सेवा कर प्रणाली लागू की गई थी जो मेरी दृष्टि में नई आर्थिक नीति के बाद दूसरा बड़ा आर्थिक सुधार माना जा सकता है। जीएसटी के लागू होने के समय पूर्ण आधारभूत सरंचना न होने से इसमे बहुत खामियां सामने आई थी जिसके कारण देश की जीडीपी 5.7 तक घट गयी थी और आज जीएसटी कॉउंसिल और वित्त मंत्रालयों के द्वारा किये जा रहे प्रयासों से जीडीपी दर को 7 प्रतिशत तक पहुंचा दिया गया है। जो इस देश के आर्थिक विकास के लिए सही कारगार सिद्ध हो रहा है। किसी भी देश के आर्थिक विकास और स्थिति का आंकलन उस देश की जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद से ही किया जाता है। जीडीपी के साथ देश की विकास दर, देश में प्रति व्यक्ति आय और जनता की क्रय शक्ति को भी आधार माना जाता है। जीडीपी यानी ‘सकल घरेलू उत्पाद’ एक साल में देश मे निर्मित होने वाली वस्तुएं, अंतिम माल और सेवाओं के मूल्यों को कहते है देश की विकास दर और प्रति व्यक्ति आय का अहम योगदान होता है। विकासशील और अविकसित देशों में प्रति व्यक्ति आय विकसित देशों की अपेक्षा कम होती है। प्रति व्यक्ति आय कम होने से जनता की क्रय शक्ति कम होती है। क्रय शक्ति कम होने के कारण वस्तु एवम सेवाओं के निर्माण और आदान प्रदान में भी बहुत कमी आती है और इस कारण देश में रोजगार में कमी और बेरोजगारी परस्पर बढ़ती जाती है। बेरोजगारी बढ़ने से देश में गरीबी बढ़ जाती है। जो उस देश के आर्थिक विकास में बहुत बड़ी बाधा उतपन करती है।



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